Wednesday, 27 April 2016


फ़कीर बनके उनके घर पे, जब से धूनी रमा के बैठे |
    वो न आये तब से दर पे, जब से अखियाँ सजा के बैठे |

हुई है जबसे ये दिल्लगी है, उन्ही की तबसे ही बंदगी है
निगाहों में उनकी तिश्नगी (thirsty) है, जबसे आँखों में समा के बैठे |

बिजलियों में हो जैसे पानी, जुल्फें हो घटाओ की निशानी 
बारिशों की वो रातरानी, बदन पे सावन सजा के बैठे |

वही जो राधा की थी कहानी, हुई थी जिसमे मीरा भी दीवानी
लिखे तो कम हो समंदरों का  पानी, जो प्रेम रोग हम लगा के बैठे |
 







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