फ़कीर बनके उनके घर पे, जब से धूनी रमा के बैठे |
वो न आये तब से दर पे, जब से अखियाँ सजा के बैठे |
हुई है जबसे ये दिल्लगी है, उन्ही की तबसे ही बंदगी है
निगाहों में उनकी तिश्नगी (thirsty) है, जबसे आँखों में समा के बैठे |
बिजलियों में हो जैसे पानी, जुल्फें हो घटाओ की निशानी
बारिशों की वो रातरानी, बदन पे सावन सजा के बैठे |
वही जो राधा की थी कहानी, हुई थी जिसमे मीरा भी दीवानी
लिखे तो कम हो समंदरों का पानी, जो प्रेम रोग हम लगा के बैठे |